सौ-सौ सिंहों से तुम बलशाली?!

Shivanshi Srivastava India, Random 4 Comments

नवरात्रि की संध्या-वंदना चल रही थी। दुर्गा माँ की आरती शुरू हुई, पर सौ-सौ सिंहों से तुम बलशालीपर आते-आते मेरा मन पूजाघर से कहीं दूर जा चुका था।

सौ-सौ सिंहों से तुम बलशाली?!

उसी विचारावेग को शब्दों का रूप देने का एक प्रयास है यह पोस्ट।

एक तरफ हम गाते हैं “सौ-सौ सिंहों से तुम बलशाली”, दूसरी ओर खुद को उस शक्तिस्वरूपा जैसा बनाने का लेशमात्र भी प्रयास नहीं करते। सामान उठाने के लिए भी आपको सहायता चाहिए औरों से! एक क्षण को रुककर सोचिए कि आपमें और उस देवी में इतना अधिक अंतर क्यों है? थीं तो वह भी महामानव ही!

हम बोलते रहते हैं कि धर्म में नारी को इतना ऊँचा स्थान प्राप्त है, तो आधुनिक काल में ऐसा क्यों नहीं है। परन्तु क्या हम आत्म-विश्लेषण भी करते हैं?

प्रकृति का नियम है: हमेशा शक्तिशाली जीव का ही वर्चस्व रहेगा।

तो क्या आप स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए कुछ करती हैं? क्या आपके विचारों में वो ओज है, क्या आपने शक्ति साधना करने की कोशिश भी की है? क्या आप खुद ही स्वयं को कमजोर नहीं समझती हैं? क्या उन वैदिक विदुषियों और वीरांगनाओं के सामने आप कहीं ठहरती हैं?

और यदि आपको लगता है मेरी बात सही है, तो दूसरों को अपनी गति के लिए उत्तरदायी मत ठहराइए। स्वयं को शक्तिशाली बनाइये। क्योंकि वर्चस्व शक्तिशाली जीव का ही होता है और यह कभी नहीं बदलेगा 

क्षमा चाहूँगी, पर मेरी ‘एम्पावरमेंट’ या सशक्तिकरण की परिभाषा आपसे थोड़ी भिन्न है।

मुझे पिछले दिन से थोड़ा और शक्तिशाली बनना है। शक्तिशाली – शरीर, मस्तिष्क, आर्थिक रूप और मन से। मुझे खुद को गढ़ना है।

मुझे स्वेच्छा और थोपे गए विचारों में अंतर पता है। मेरी अपनी विचारधारा है और किसी में साहस नहीं है कि वह बिना तर्क के मेरे विचारों में जरा भी अंतर ला सके।

श्रृंगार का अधिकार मुझे नहीं चाहिए, क्योंकि उससे मेरा ही समय बर्बाद हो रहा है। मुझे पता है कि मुझे उन हील वाली चप्पलों से ज्यादा जूते पसंद हैं, तो कोई कितना भी कह ले – मैं वह नहीं पहनूँगी। (गिरना थोड़े ही है!)

मैं नहीं चाहती कि मैं भी दूसरों की तरह मदिरापान या सिगरेट की आदि बनकर स्वयं को ही नुकसान पहुँचाऊँ।

सबसे आवश्यक बात – मुझे सही-गलत में अंतर पता है।

मैं यह कभी नहीं कहूँगी कि क्योंकि अमुक व्यक्ति ऐसा कर रहा है और लोग ऐसा करने को ‘कूल’ बोलते हैं, मुझे भी ऐसा करना है। और हाँ, यदि आपको लगता है कि में गलत कर रही हूँ, तो तर्क करिये। वाद-विवाद करिये। कभी यह मत कहिये कि ‘लड़कियाँ ऐसा नहीं करती, इसलिए तुम्हे नहीं करना चाहिए।’

लोग पूछते हैं कि स्त्रियां क्यों कम हैं तकनीक के क्षेत्र में या क्यों वह व्यापार क्षेत्र में आकर जोखिम नहीं लेती हैं? मुझे यह समझाने में समय लगता है कि परिवेश और मानसिकता है उत्तरदायी।

बचपन से आप उन्हें सिखाते हैं कि आप कमजोर हैं, कोमल हैं, सहायता ले सकती हैं। जरा-जरा सी बातों में सहायता करते हैं। उन्हें कभी नहीं कहते कि आपमें सबकुछ करने क्षमता है। और ऐसी मनोवृत्ति बचपन से उनमें डालने के पश्चात आप आशा करते हैं कि वह अधिक से अधिक जोखिम लें। कैसे संभव है?

मनुष्य का व्यक्तित्व एक दिन में तैयार नहीं हो जाता है। वर्षों लगते हैं। पर हाँ, यदि आप स्वयं बदलना चाहें, तो नया व्यक्तित्व भी गढ़ा जा सकता है – शून्य से!

स्वच्छंद बनिये, बलिष्ठ बनिये। सब सीखिए, जो आपको पसंद है। और हाँ – दम्भ और ‘शक्ति के छद्म’ से बचिए, क्योंकि यही हमें असली प्रगति से रोकता है। (‘शक्ति के छद्म’ से मेरा तात्पर्य उन गतिविधियों से है, जिन्हें करने से नुकसान होता हो, पर वह क्षणिक शक्ति का आभास कराती हों।)

देवी की अर्चना मत करिये, उनको प्रेरणा बनाइये। अपने ऊपर निर्भर /अपने से जुड़े हर व्यक्ति के विकास में मदद करिये। अपने कार्यक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनिये। वेद पढ़िए। धर्म ग्रंथ पढ़िए। योग और व्यायाम करिये। लोगों को समय दीजिये।

देवी को प्रलोभन मत दीजिये। वह स्वयं खुश हो जाएंगी।

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P.S. – भावावेग में लिखा है और ट्विटर में ‘एडिट’ भी नहीं कर सकते, तो लेखन त्रुटियों के लिए पहले ही क्षमाप्रार्थी हूँ।

#Navratri

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Comments 4

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  1. आपकी सोच से, भाषा के उपयुत शब्दों के प्रयोग से, I am impressed. Now Will follow your blog regularly. मेरी प्रारंभिक शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई थी, फिर अंग्रेज़ी ने आकर सारा गुड़ गोबर कर दिया.

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      Thank you so much, sir 🙂

      I’ve also studied in Hindi and English medium schools, both. You can always switch back to Hindi. ?

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