नीम का पेङ

Shivanshi Srivastava Random Leave a Comment

ग्यारहवीं कक्षा में थी मैं उस समय। तब हम लोग जसपुर में रहते थे। छोटा सा कस्बा है उत्तराखंड में, पर मैदानी इलाके में ही आता है – उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर। उत्तराखंड में बिजली की व्यवस्था अच्छी थी, इसलिए हम वहाँ रहते थे, पापा का कॉलेज तो यू. पी. में ही पड़ता था।

हर स्थानीय खेल आता था उस समय – ती-ती-ता (हाँ – लंगड़ी ?), नारियल, खो-खो, बैडमिंटन, कबड्डी और पता नहीं कितने ही खेल।

वृन्दावन में तो हम लोग बहुत खेलते थे।  पर यहाँ पहली मंजिल का घर, ऊपर से कोई दोस्त नहीं। स्कूल भी काशीपुर में था, तो स्कूल वाले दोस्त भी 20 किलोमीटर दूर रहते थे। दो ही मनोरंजन के साधन थे। घर पर पेड़-पौधे, और स्कूल में वॉलीबॉल।

साइकिल चलाने तक को मुश्किल से मिलता था, पर मम्मी पापा ने घर में बहुत सारे पौधे लगाए थे उस समय। उनके साथ समय व्यतीत करने में अलग प्रकार की शांति मिलती थी।

इन सबमें सबसे अच्छा लगता था वो नीम का पेड़।

हमारी आधी छत को ढककर रखता था। कल एक दोस्त ने एक फोटो शेयर किया, तो उसी की याद आ गयी। फिर से।

पेड़ के नीचे बहुत-सी गाय-भैंसे रहती थी। आस-पड़ोस के घरों के बच्चे भी आ जाते थे इसीलिए हमारे यहाँ, हमारे साथ खेल देखने। हम शहर वालों के लिए तो कौतूहल का विषय ही था यह। भैंसो के लिए सानी कैसे बनती है वो कैसी और कितनी घास खाती, हमें क्या पता!

जब उस पर फूल आते, तो पूरी छत भर जाती थी उनसे। बहुत सुन्दर लगता था सब। हम लोग आइस-क्रीम, बादल, और ना जाने क्या-क्या बनाते थे उन फूलों को इक्कठा करके। एकदम बढ़िया 3-डी आकृतियाँ बनती थीं और इसी बहाने मम्मी का काम भी सरल हो जाता था, क्योंकि इकट्ठे हुए फूलों को फेंकना रहता था बस।

फिर उसमें कच्ची निमोरियाँ लगती थीं। खा तो सकते नहीं थे, पर टूट कर गिरती थीं तो फेंक-फेंक कर मारते थे सबको। जो पहले छत पर पहुँच जाता, वो खूब सारी निमोरी इकठ्ठा करके रखता बाकियों को मारने के लिए। अजीब खेल होते थे उस समय हम लोगों के।

कुछ समय बाद पककर वही निमोरियाँ बहुत अच्छी लगने लगती थीं। फिर हम खेलना छोड़कर उन्हें खाना शुरू कर देते थे।

पहले मीठी निमोरी खायी नहीं थी कभी। और कच्ची निमोरी इतनी कड़वी होती थी कि जब पापा कहते थे कि ये पककर बहुत मीठी लगेंगी, तो विश्वास ही नहीं होता था।

पढ़ने से लेकर गन्ने खाना, खेलना, पक्षियों के लिए खाना रखना, बारिश देखना, मौसम साफ़ हो जाए तो कालागढ़ के पहाड़ देखना, दीपावली और जाने क्या-क्या फालतू के कामों का साक्षी था वो पेड़।

मैं तो होली पर भी उसके तने या कुछ पत्तियों पर तो रंग लगा ही देती थी। उससे बात करना भी बहुत पसंद था मुझको, अभी भी करती हूँ पौधों से बात… इंसानों से तो होती नहीं इतनी ?

बस सर्दियों में एक समस्या रहती थी। जिसके घर में वो नीम का पेड़ था, उनके घर की, और हमारे घर की आधी से ज्यादा धूप वो पेड़ रोक लेता था। हमारे घर के दो कमरे उसकी वजह से बहुत ठन्डे रहते थे। इस पर मम्मी थोड़ा उस पर गुस्सा हो जातीं, तो मुझे तरफदारी करनी पड़ती थी।

फिर एक दिन, स्कूल से लौटने पर रोज से ज्यादा रोशनी दिख रही थी। मम्मी से पूछा कि आज ज्यादा उजाला नहीं लग रहा आपको? उन्होंने बोला कि पेड़ काट रहे हैं पीछे वाला।

मैंने पूछा कि आपने रोका क्यों नहीं, बोलती हैं कि पागल हो क्या? अपना थोड़े ही है।

बैग फेंककर छत पर गयी तब तक उसकी जड़ निकालना बचा था बस, बाकी हिस्सा जा चुका था। जड़ की खुदाई भी हो ही चुकी थी सब तरफ से, बस उसे निकालना बचा था। ?

ऐसे रोती नहीं हूँ मैं, किसी के सामने तो बिलकुल भी नहीं। पर उस दिन बहुत रोई नीचे वापस आकर। शायद पिछले 8-9 साल में सबसे ज्यादा। अभी तक हँसते हैं घर में सब मुझपर, इस बात के लिए। उन्हें क्या पता! ?

छत पर बहुत रोशनी आती थी अब, पर खाली छत बहुत बुरी लगती थी मुझे।

मकान मालिक खुश थे क्योंकि उन्हें लगता था कि उस पेड़ की वजह से चोरी का खतरा था, वो खत्म हो गया। मम्मी खुश थी कि सर्दी कम लगेगी। जिसका पेड़ था, उसके लिए भी वहाँ और अच्छा घर बनाना संभव था अब। सबके अपने-अपने स्वार्थ! ?

छत पर जाना लगभाग बंद कर दिया फिर। जाने पर खाली-खाली छत देखने और पेड़ की कल्पना करने से तो अच्छा ही था!

बहुत याद आती है उसकी आज भी कभी-कभी। ?❤️

काश मानव भी कभी थोड़ा कम स्वार्थी हो जाए… काश ?

कहानी तो ख़त्म, पर अब आप यहाँ तक आ ही गए हैं तो एक बात सुनते जाइएगा… पालने हैं, तो पेड़-पौधे पालिये। वो कहीं नहीं जाएंगे। जानवरों की स्वच्छंदता में बाधा मत बनिए।

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