सनातन ज्ञान बनाम आधुनिक भक्ति

Shivanshi Srivastava Random 1 Comment

अभी रास्ते में बज रहे भजन सुन रही थी। मन में सहसा विचार आया कि वह ज्ञान, जो सदियों तक श्रव्य रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जा रहा था, कहाँ गया? अब भजन और आरतियाँ तो होती हैं, पर उनमें कथाएँ या ‘ज्ञान’ नहीं है।

उदाहरण के लिए, यह गीत देखिये –

क्या कहना चाहती हैं ये?

“माता आप मेरा कार्य करा दीजिये, और मैं आपको उसका पारितोषक दूँगी।”

यही ना?

कोई भी गीत उठाइये, आप उसमें शुरू से अंत तक उस देव/देवी की बढ़ाई ही पाएंगे। ऐसा लगता है कि मानो उनकी ‘पूजा’ से ही सब हो जाएगा। माँ अच्छी है, शक्तिशाली है, सारे दुःख हर लेगी – क्यों? आपको सामर्थ्य नहीं दिया क्या माँ ने?

यहाँ मैं यह नहीं कह रही हूँ कि आप दान या पुण्य-कर्म ही ना करें, बल्कि यह कह रही हूँ कि उसे निस्वार्थ भाव से करें। अपने लोभों के लिए दान का कोई लाभ नहीं है।

“मेरी नौकरी लग जाए, तो इतने रूपये का प्रसाद चढ़ाऊँगी।”
अरे! अपने सामर्थ्य के अनुसार कार्य करिये और उतना सामर्थ्य बनाने के लिए सबसे अधिक कार्य कीजिये। क्या परेशानी है?

वैदिक ज्ञान, दर्शन, आध्यात्म, शास्त्र आदि सब भूलकर हम सिर्फ ‘पूजा-अर्चना’ को ‘धर्म’ मानने लगे। खुद सोचिये क्या यही है धर्म? हजारों ग्रन्थ पड़े हैं पढ़ने को। उनके गूढ़ अर्थ को समझने में जीवन निकल व सुधर सकता है। तो बताइये – क्या आपको पास समय है इन आडम्बरों में पड़ने का?

क्या आपको नहीं लगता कि ज्ञान और विचारों को आगे बढ़ाना छोड़कर हम एक अजीब ही परंपरा बना रहे हैं? तर्कहीन होकर अंधभक्ति करने की परंपरा !

“ऐसा नहीं होता तो बस, नहीं होता।”

“बड़े-बूढ़े कहते हैं, किसी कारण से की कहते होंगे।”

हाँ, मानती हूँ। कहते होंगे। मैंने खुद कई कहावतों या नियमों के तथ्य निकालें हैं और जानती हूँ कि सनातन या वैदिक धर्म में कोई बात बिना तर्क के कही ही नहीं गयी होगी। पर मुझे कारण के साथ बात समझाइये ना।

ये तो वही बात हुई कि यदि कुछ समझ ना आये तो रट लो बस।

अब रटने का नुकसान यह है कि हम ऐसी बातों से डर सकते हैं, उनके लिए दूसरों से झगड़ सकते हैं, पर ना तो हम आगे वाली पीढ़ी को वह मानने को मना पाते हैं और ना ही लोग हमारी बातों से जुड़ पाते हैं।

किसी भी विचार के प्रसार के लिए उसमें तर्क होना आवश्यक है।

तर्क ना होने का दूसरा नुकसान यह है कि नकली, थोपी हुई, किसी डर (मुख्यतः आक्रांताओं के कारण) से बनी या उधार वाली प्रथाएँ आपके धर्म से जुड़ जाती हैं और आपको पता ही नहीं चलता।

उदाहरण के लिए – घूंघट प्रथा पर जोर देने वाले ग्रामीणों को नहीं पता कि यह हमारे धर्म का हिस्सा नहीं है। दक्षिण वाले आज मातृसत्तात्मक समाज नहीं हैं, जैसा कि वह पहले हुआ करते थे।

सत्य जानना है?

वैदिक समय की रचनाएँ खंगालिए।

ऋग्वेद को उठाइये। उसे पढ़िए।

आपको पता चलेगा कि उसमें 27-30 तो ऋषिकाएँ हैं। कुछ विशेषण भी देख लीजिये, जिनका प्रयोग उस समय किया जाता था महिलाओं के लिए –

और आप कहते हैं कि बच्चियों को पढ़ाया नहीं जाता था पहले?

कितना गलत है यह!

आयुर्वेद में घुस जाइये। विस्मयाभिभूत हुए बिना नहीं रह पाएंगे आप।

भ्रांतियों को बढ़ावा मत दीजिये, आडम्बरों को आगे मत बढ़ाइए ?

 

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Comments 1

  1. बहुत सही विचार है ये। लोग भक्ति को समझ ही नही पाते और सौदेबाजी करने लगते है। जरूरत है सही गुरु की जो मार्गदर्शन करें। लेकिन इसके विपरीत आज कल के गुरु भी सौदेबाज ही है और मूल्य सिर्फ पैसे है।

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